इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के संयुक्त गैर शिक्षक कर्मचारी संघ के समस्त पदाधिकारी, कर्मचारीगण एवं सर्व समाज के प्रतिनिधिगण विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा द्वारा दिए गए अमर्यादित, अपमानजनक और असंवेदनशील बयान की तीव्र निंदा करते हुए सशर्त माफ़ी मांगने की कुलपति से मांग की हैं ।

कर्मचारियों ने बताया कि कुलपति डॉ. लवली शर्मा ने अपने बयान में गैर शिक्षक कर्मचारियों को “अभिशाप” जैसे आपत्तिजनक शब्द से संबोधित किया, जो केवल हमारे कर्मचारियों का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के निवासी अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग व सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों का भी घोर अपमान है। विश्वविद्यालय की नींव जिन कर्मचारियों के परिश्रम से पिछले 40 वर्षों में सशक्त और सुव्यवस्थित बनी, उन्हीं कर्मचारियों को “गुणहीन”, “अप्रशिक्षित” और “अनावश्यक” बताना न केवल अपमानजनक है, बल्कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति, मेहनतकश परंपरा और गरिमा के विरुद्ध भी है।

यह सर्वविदित है कि विश्वविद्यालय के गैर शिक्षक कर्मचारी मूलतः छत्तीसगढ़ के निवासी हैं, वरिष्ठ कर्मचारी सी आर कुंजाम, जय नारायन सठिया, कैलाश हुमने, नवीन मोहबे, दिनेश्वरी देवदास जो सभी लोग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं। इन वर्गों के कर्मचारियों को “अभिशाप” करार देना संविधान के मूलभावना और सामाजिक न्याय के विरुद्ध है। यह बयान न केवल मानहानिकारक है बल्कि जातिगत पूर्वाग्रह और मानसिकता को भी उजागर करता है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुलपति स्वयं उत्तर प्रदेश से होकर इस विश्वविद्यालय में पदस्थ हैं, और छत्तीसगढ़ की परंपरा, मर्यादा और सम्मान की समझ या स्वीकार्यता उनके वक्तव्यों में नजर नहीं आती। खैरागढ़ विश्वविद्यालय ने सदैव बाहर से आए हुए छात्र- छात्राएं व्यक्तियों को सम्मान और सहयोग प्रदान किया है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि कोई बाहर से आकर यहां के मूल निवासियों को हीन भावना से देखे या उन्हें “अभिशाप” कहे।

कुलपति के वक्तव्य के कुछ अंशों में यह भी कहा गया है कि कर्मचारी स्किल्ड नहीं हैं, उनका कोई महत्व नहीं है, अगर आवश्यकता होगी तो बुलाया जाएगा, नहीं होगी तो नहीं बुलाया जाएगा। यह रवैया दर्शाता है कि वे इस विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को केवल “कामचलाऊ” या “उपयोग की वस्तु” मानती हैं, न कि एक संस्था की मूल आधारशिला।

संघ स्पष्ट करना चाहता है कि इस विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व कार्यलीय संरचना को इन कर्मचारियों ने अपने खून-पसीने से खड़ा किया है। आज यदि यह संस्थान ख्यातिप्राप्त है तो उसमें इन कर्मठ कर्मचारियों का समर्पण, सेवा और अनुशासन ही मूल कारण है। उनके योगदान को इस प्रकार खारिज करना निंदनीय है।

हम यह स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं कि कुलपति डॉ. लवली शर्मा का यह बयान केवल कर्मचारियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता और छत्तीसगढ़ की गरिमा पर सीधा आघात है। यह अस्वीकार्य है। हम कुलपति महोदया से मांगनिम्न करते हैं :

  1. कुलपति डॉ. लवली शर्मा तुरंत “अभिशाप” शब्द वापिस लें और सार्वजनिक रूप से शशर्त माफी मांगें।
  2. गैर शिक्षक कर्मचारियों को “गुणहीन” और “अप्रशिक्षित” बताने की टिप्पणी पर खेद प्रकट किया जाए।
  3. कर्मचारियों की मांगों को दबाव या स्वार्थ न मानकर, एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत तत्काल वार्ता प्रारंभ की जाए।
  4. इस पूरे प्रकरण की जांच शासन स्तर पर करवाई जाए और संबंधित अपमानजनक टिप्पणी के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।
  5. भविष्य में कर्मचारियों के सम्मान के विरुद्ध कोई भी टिप्पणी या व्यवहार न किया जाए।

हम यह भी घोषणा करते हैं कि इस अपमानजनक वक्तव्य के विरोध में संघ 17 जुलाई 2025 से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाएगा, जिसमें सर्व समाज के लोग और विभिन्न कर्मचारी वर्ग भी सहभागिता देंगे। यह आंदोलन किसी स्वार्थ का नहीं, बल्कि सम्मान, गरिमा और हक की लड़ाई है।
यह विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति विशेष की जागीर नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्था है, जिसे मानवता, सहयोग और समर्पण से चलाया जाता है, न कि तानाशाही, अपमानजनक और जातिवादी सोच से।
यदि शासन और विश्वविद्यालय प्रशासन समय रहते समाधान नहीं करता, तो हम इस आंदोलन को प्रदेश स्तर पर ले जाने को बाध्य होंगे। इसकी पूर्ण जिम्मेदारी कुलपति और प्रशासन की होगी l