साहित्य, संगीत और कला मनुष्य को केवल मनोरंजन नहीं देते, वे उसे मनुष्य बनाते हैं। संवेदना, करुणा, भावनाएं, मानवीयता, आदर्श, सभ्यता और संस्कार—इन सबका अंकुरण कला के संसार में होता है। कला मनुष्य को अपने सीमित स्वार्थों से ऊपर उठाकर दूसरे के सुख-दुःख को समझने और दुनिया को व्यापक मानवीय दृष्टि से देखने की क्षमता देती है। इसलिए किसी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक समृद्धि से नहीं, उसकी संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना से भी होती है।
भारतीय चिंतन परंपरा में साहित्य, संगीत और कला की इसी मानवीय भूमिका को अत्यंत सारगर्भित ढंग से कहा गया है—
“साहित्य-संगीत-कला-विहीनः
साक्षात् पशुः पुच्छ-विषाण-हीनः।”
अर्थात साहित्य, संगीत और कला से विहीन मनुष्य की मनुष्यता अधूरी है।
कला - सृजन, संवेदना और संवाद का सशक्त माध्यम
41वें ऐतिहासिक चक्रधर समारोह के राष्ट्रीय मंच पर बस्तर के कलाकारों की रंगकर्म प्रस्तुति ने इस विचार को जैसे जीवंत कर दिया। हिंसा के रास्ते से लौटकर रंगमंच और सृजन से जुड़ना केवल किसी कलाकार की व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि उस व्यापक संभावना का संकेत है जिसमें मनुष्य हिंसा से संवाद, अलगाव से सहभागिता और विनाश से सृजन की ओर लौट सकता है। बस्तर को अक्सर नक्सली हिंसा और संघर्ष के संदर्भ में देखा जाता रहा है। लेकिन बस्तर की पहचान केवल हिंसा नहीं है। उसके भीतर आदिवासी जीवन-दृष्टि, लोकगीत, लोकनृत्य, रंगपरंपरा, शिल्प और प्रकृति से गहरे जुड़ी सांस्कृतिक चेतना की समृद्ध दुनिया है। इसलिए बस्तर के कलाकारों का किसी राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंच पर आकर अपनी कला प्रस्तुत करना उसके दूसरे और अधिक मानवीय चेहरे को सामने लाता है।वास्तव में कला - सृजन, संवेदना और संवाद का सशक्त माध्यम होता है।
रंगमंच सामाजिक सांस्कृतिक चेतना का सशक्त माध्यम है
रंगमंच की अपनी विशिष्ट शक्ति है। रंगमंच सामाजिक सांस्कृतिक चेतना का सशक्त माध्यम है-जो मनुष्य को दूसरे मनुष्य के करीब ले जाता है l अभिनेता को किसी दूसरे पात्र का जीवन जीना पड़ता है। उसके सुख-दुःख, उसकी पीड़ा और उसकी मनःस्थिति को समझना पड़ता है। दर्शक भी कुछ समय के लिए अपने जीवन की सीमाओं से बाहर निकलकर किसी दूसरे जीवन की अनुभूति करता है। इस तरह रंगमंच मनुष्य को दूसरे मनुष्य के करीब ले जाता है।
यहीं कला की वास्तविक सामाजिक शक्ति दिखाई देती है। हिंसा संवाद को समाप्त करती है, जबकि कला संवाद को जन्म देती है। हिंसा भय पैदा करती है, कला विश्वास जगाती है। हिंसा विभाजन करती है, कला पुल बनाती है।
इसीलिए बस्तर के कलाकारों का रंगकर्म से जुड़ना केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम की एक प्रस्तुति भर नहीं माना जाना चाहिए। यह पुनर्संवाद और पुनर्सृजन की दिशा में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संकेत है। आज जब यह समारोह देश के विभिन्न हिस्सों के कलाकारों को एक मंच पर लाता है, तब वह केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं रह जाता; वह विविध संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बन जाता है। बस्तर का कलाकार जब रायगढ़ के मंच पर अपनी कला प्रस्तुत करता है और रायगढ़ का दर्शक उसे खुले मन से स्वीकार करता है, तब यह केवल दो क्षेत्रों का मिलन नहीं होता—यह दो अनुभव संसारों का संवाद होता है।
संगीत, रंगमंच और लोककलाएं मनुष्य को जोड़ने का काम करती हैं
आज के समय में इसकी आवश्यकता और बढ़ गई है। समाज में जब अविश्वास, असहिष्णुता और विभाजन की प्रवृत्तियां बढ़ती हैं, तब साहित्य, संगीत, रंगमंच और लोककलाएं मनुष्य को जोड़ने का काम कर सकती हैं। विशेषकर संवेदनशील और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में युवाओं को कला, खेल, शिक्षा और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना केवल सांस्कृतिक नीति का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्निर्माण का भी महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। हालांकि कला अकेले किसी जटिल सामाजिक या राजनीतिक समस्या का समाधान नहीं कर सकती। लेकिन वह समाधान के लिए आवश्यक संवाद, संवेदना और विश्वास की जमीन अवश्य तैयार कर सकती है। इसलिए जब कोई व्यक्ति या समूह हिंसा का रास्ता छोड़कर सृजन की राह चुनता है, तो समाज का दायित्व भी केवल उसका स्वागत करना नहीं, बल्कि उसे सम्मान और अवसर देना है। मुख्यधारा में लौटना तभी सार्थक होगा, जब मुख्यधारा स्वयं इतनी व्यापक और संवेदनशील हो कि वह विविध अनुभवों और संस्कृतियों को सम्मानपूर्वक स्थान दे सके।
साहित्य संगीत कला में समाज,संवेदनाएं, प्रश्न ,संवाद और मनुष्यता जीवित रहती है
चक्रधर समारोह का यह प्रसंग इसी बड़े प्रश्न की ओर संकेत करता है—क्या हम कला को केवल मंच और मनोरंजन तक सीमित रखेंगे, या उसे समाज के पुनर्निर्माण की शक्ति के रूप में भी देखेंगे? उत्तर हमारे सांस्कृतिक दृष्टिकोण में छिपा है। जिस समाज में साहित्य जीवित रहता है, वहां प्रश्न जीवित रहते हैं। जहां संगीत जीवित रहता है, वहां संवेदनाएं जीवित रहती हैं। जहां रंगमंच जीवित रहता है, वहां संवाद की संभावना जीवित रहती है। और जहां कला जीवित रहती है, वहां मनुष्यता के बचे रहने की संभावना भी बनी रहती है। बस्तर के कलाकारों की प्रस्तुति इसी संभावना की एक सुंदर मिसाल है। 41वें चक्रधर समारोह के मंच पर उस दिन शायद केवल एक नाटक प्रस्तुत नहीं हुआ था। वहां एक विचार मंचित हुआ था—कि हिंसा से बड़ी शक्ति सृजन की है और मनुष्य को जोड़ने की क्षमता विनाश में नहीं, कला में है।
यही उस प्रस्तुति का सबसे बड़ा संदेश है। क्योंकि कला मनुष्य को केवल संवेदनशील नहीं बनाती, वह उसे दूसरे मनुष्य की पीड़ा समझने और उसके साथ खड़े होने योग्य मनुष्य भी बनाती है। बस्तर से उठती यह रंगमंचीय आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह हमें याद दिलाती है—जहां बंदूक की आवाज थमती है, वहां संवाद की आवाज शुरू हो सकती है; और जहां संवाद जन्म लेता है, वहीं से सृजन और मनुष्यता की नई पटकथा लिखी जाती है।
गणेश कछवाहा
रायगढ़, छत्तीसगढ़।
gp.kachhwaha@gmail.com
