कहते हैं यदि दिल से किसी को चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने जुट जाती है, मंगलवार को ममता और संघर्ष की एक ऐसी दास्तां मुकम्मल हुई, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम कर दीं। बिहार के भागलपुर की रहने वाली पूजा पिछले 11 महीनों से अपनी लापता माँ बबीता देवी की तलाश में दर-दर भटक रही थी। जब मंगलवार को माँ-बेटी का आमना-सामना हुआ, तो भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। पूजा औऱ उसकी माँ के आँखों से बहते आंसू अब गम के नहीं बल्कि उस सुकून के थे जिसे शब्दों में बया करना मुमकीन नहीं l पूजा दौड़कर अपनी माँ के पैरों में गिर गई और दोनों काफी देर तक एक-दूसरे से लिपटकर रोते रहे। यह मिलन उस अटूट विश्वास का परिणाम था, जिसके लिए एक बेटी ने अपनी नौकरी तक दांव पर लगा दी। किस्मत ने पूजा से उसके जन्म से पहले ही पिता छिन लिया था, लेकिन इस बार नियति को ममता के आगे झुकना पड़ा l
इस कहानी की शुरुआत पिछले साल 3 जून को हुई थी, जब 65 वर्षीय बबीता देवी अपने मायके जगतपुर जाने के लिए घर से निकली थीं। उन्होंने अपनी बेटी पूजा से 10 दिन में लौटने का वादा किया था, लेकिन वह वापस नहीं पहुँचीं। पूजा के जीवन में दुखों का सिलसिला बहुत पुराना है। उसके जन्म से पहले ही पिता का अपहरण हो गया था और तब से माँ-बेटी ही एक-दूसरे की पूरी दुनिया थे। माँ के अचानक गायब हो जाने से पूजा की दुनिया ठहर गई थी। उसने भागलपुर से लेकर पूर्णिया और कटिहार तक के दर्जनों वृद्धाश्रमों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों की खाक छानी। दीवारों पर पोस्टर चिपकाए और पुलिस से गुहार लगाई, लेकिन माँ का कहीं पता नहीं चला। तलाश का यह कठिन सफर तब खत्म हुआ जब भिलाई के फील परमार्थम आश्रम की टीम को बबीता देवी विक्षिप्त अवस्था में मिलीं। आश्रम के संस्थापक अमित राज ने उन्हें आश्रय दिया। लंबे समय तक अपनी सुध-बुध खोए रखने के बाद, 10 मई को अचानक बबीता देवी जिन्हें वें प्यार से फूंकी बुलाते थे उनकी यादों में ‘जगतपुर बांका’ नाम उभरा। इसी एक शब्द ने उम्मीद की किरण जगाई और आश्रम की टीम ने बांका पुलिस के जरिए पूजा से संपर्क साधा। जब पूजा को माँ के भिलाई में होने की खबर मिली, तब वह एक कोचिंग में काम कर रही थी। छुट्टी न मिलने पर उसने बिना संकोच अपनी नौकरी छोड़ दी और तुरंत जनरल बोगी में सवार होकर भिलाई पहुँच गई। पूजा का यह संघर्ष न केवल एक बेटी के साहस की मिसाल है, बल्कि फील परमार्थम जैसे संस्थानों की सेवा भावना का भी प्रमाण है, जो अब तक 50 से अधिक बिछड़े हुए लोगों को उनके परिवारों से मिला चुके हैं। 11 महीने बाद माँ का हाथ अपने सिर पर महसूस कर पूजा के चेहरे पर जो सुकून था, उसने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे सच्चे हों तो मंजिल जरूर मिलती है। अब बबीता देवी वापस अपने घर भागलपुर लौट रही हैं, जहाँ उनकी बेटी उनकी नई दुनिया सजाने के लिए तैयार है। वहीं पूजा अपनी मां से मिल चुकी है औऱ खुश है l

